सूफ़ी बुजुगों
अनमोल बातें
संकलन एवं व्याख्या .
मुहम्मद फ़ारूक़ खाँ
भूमिका ह
[. ह $
8. * रसूल (सल्ल.) का आज्ञापालन प्र
8 सूफ़ीवाद की मूल आत्मा 8 -
4... यथार्थ दर्शिता ह ह 0
5. , ईश्वर से सम्बन्ध और ईश-भय १2
6... दृष्टि परलोक (आख़िरत) पर 75
7. .परोक्ष (गैब) का महत्व 6 ,
* 8. सुकर्म | 0
9. मानक्-आत्मा . 8
0. मौन... 20
' [. प्रभुं-रचना यासृष्टि.. 29
2. नमाज़ और उपासना 24
प8, समये ७. ४. > 96:.
-74. कुछ महत्वपूर्ण विषय .: ह ]
सूफ़ी बुल्लुगों की अनमोल चांतें का 9-
। बिसमिल्लाहिरहमानिरहीम
“अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त दयावान बहुत कृपाशील है”
भूमिका
इस्लाम जैसा कि उसके नाम ही से स्पष्ट है, अपने आप को सम्पूर्ण रूप
से अपने स्रष्टा, पालनहाँर और स्वामी ईश्वर के हवाले कर देने का नाम है।
यानी अपना पूरा जीवन ईश्वर के आदेशों और निर्देशों के अनुसार व्यतीत
करने का नाम इस्लाम है। और ईश्वर के आदेश हमें पवित्र कुरआन और
ईश्वर के पैग़रम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की पवित्र जीवनी से प्राप्त हो
सकते हैं। हमें यह बात अपने समक्ष अवश्य रखनी.चाहिए कि इस्लाम ने
केवल बाह्य जीवन को संवारने और दुरुस्त रखने के लिए ही क़ानून, नियम
और सिद्धान्त आदि की शिक्षा नहीं दी है बल्कि धर्म के आन्तरिक पक्ष और
जीवन के वास्तविक लक्ष्य और रहस्य को समझने पर भी ख़ास ज़ोर दिया
है।
इस्लामी विद्वानों ने इस्लामी क़ानून और शरीअत के आदेशों पर जो
काम किया है वह असाधारण है। इसी तरह सूफ़ियों ने दीन या धर्म के मूल
तत्व और रहस्य को समझने का जो प्रयास किया है और धर्म के आध्यात्मिक
' या रूहानी पहलू के विषय में जो कार्य किए हैं, उसकी उपेक्षा नहीं की जा
सकती।
इस पुस्तक में वर्तमान समय के महान इस्लामी विद्वान मौलाना मुहम्मद
फ़ारूक़ ख़ाँ ने सूफ़ी महापुरुषों की कुछ अनमोल बातें विभिन्न शीर्षकों के
अन्तर्गत संकलित की हैं। इसमें जीवन, आत्मा, प्रभु से सम्बन्ध और
अध्यात्म आदि के विषय में इस्लामी दृष्टिकोण से विचार व्यक्त किए गए
हैं। उनके अध्ययन से ही अन्दांज़ा किया जा सकता है कि यह चिन्तन और
. विचार कितने मूल्यवान और हमारे लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।
सूफ़ी बुझ्ुगों की अनमोल बातें... > ठ
इस्लामी साहित्य ट्रस्ट (रजि.) दिल्ली हिन्दी भाषा में इस्लाम से-सम्बन्धित -
पुस्तकें तैयार करने की सेवा में लगा हुआ.है। इस. पुस्तक़ को प्रस्तुत करते
हुए हमें अत्यन्त हर्ष. हो रहा है। इस पर हम अपने पालनह्ार ईश्वर का शुक्र
अदा करते हैं और सांथ ही हम लेखक महोदय के. भी आंभारी हैं कि उन्होंने
लोगों के लिए यह संक्षिप्त मंगर अंतिलाभदांयक पुस्तक संकलित की | ईश्वर
उन्हें इसकां अच्छा बंदला प्रदान करे।
आशा है हमारे पाठकों के लिए यह प्रयास अवश्य लाभदायक होगा।.
£ + .«.. भवदीय
--नसीम ग़ाज़ी फ़लाही
: सेक्रेद्री
इस्लामी. सहित्य ट्रस्ट
(दिल्ली)
6 | | सूफ़ी बुलुगों की अनमोल बातें
रसूल (संल्ल-) का आज्ञापालेन
“शरीर को, हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा.:(सल्ल-) का .अनुवर्ती. रखना
और दृष्टि संत्य (ईश्वर) पर रहे, यही दर्वेशी (सन्त-पथ)-है !”
, “हज़रत गुलाम अली (रह०) .
व्याख्या - सत्य या ईश-्ञान प्राप्त करने का प्रामाणिक साधन नुबूंवत वा
पैग़म्बरी है। ईश्वर ने. मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए उसे,पैदा करने के साथ
पैग़म्बरी: का सिलसिला जारी किया। पैग़ंम्बरों. या 'नंबियों पर प्रंकाशना
- 02०४००४०/) द्वांरा.लोगों के मार्गदर्शन के लिए. अपनी किताबें अवतरित
कीं । जिस तरह प्रकाश यां रौशनी के बिना आँख काम नहीं कर सकती, ठीक
उसी तरह सत्य को जानने का प्रामाणिक साधन नुबूंवत या पैग़म्बरी है। रसूल
(सल्ल-) की शिक्षाओं का प्रकाश ही हमें भटकने और गुमराह होने से बचा
सकता है। इसके बिना हप्त अविश्वास और संशय से मुक्त नहीं हो सकते। “
नबियों: की शिक्षाओं से हमें ईश्वर का ज्ञान भी प्रोप्त होता.है और हम जीवन
के मूल उद्देश्य और आशय से भी परिचित हो सकते हैं।
पैग़म्बरी का सिलसिला हज़रत मुहम्मद (सल्ल-) पर समाप्त हो गया है। '
आप (सल्ल-) पर अवतरित किताब 'क्ुरआन'. सुरक्षित है। कुरआन की _
सुरक्षा का वादा स्वयं ईश्वर ने किया है। इसके साथ हज़रत मुहम्मद (सल्ल)
का जीवन-चरित्र और आप की शिक्षाएँ पूर्णरूप से प्रामाणिक रूप में मौजूद
हैं। ज़रूरत है.कि हमं कुरआन और आप .(सल्ल-) की शिक्षाओं और आप
(संल्ल.) की जीवनी की रौशनी में जीवन में सत्य. मर्ग अपनाकर लोक और
परलोक (दुनिया और आख़िरत) में सफलता प्राप्त करें| हज़रत गुलाम अली
(रह.) यही -कहना चाहते हैं कि हमारे लिए आवश्यंक'है की नबी (सल्ल-) .
- के अनुयायी बनें, जीवन को सत्य मार्ग पर लगाएँ और आप (सल्ल-) के
आदेशानुसार अपनी दृष्टि ईश्वर पर हो उंसके ज्ञान और अभ्यास से अपने
को कृतार्थ केरें। ः
: सुफ़ी बुल्ुगों की अनमोल बातें... ” न]
सूफ़ीवाद की मूल आत्मा
* “तसौउफ़ (सूफ़ीवाद).केवल एक तरफ़ लौ लगाना, एक को देखना
. और इसी हांलत में गुज़र करने का नाम है।”
-ख़ाजा बाक़ी-बिल्लाह (रह)
“चाहिए कि देखने में लोगों के साथ हो. लेकिन अन्दर से हक़-
- (ईश्वर) के साथ हो॥” -.. * -हस्षरत अबुर्रुब्नाक़ अलवी (रह).
: “फ़क्न (सन्त-पथ) ईश्वर के सिवा किसी के साथ व्यस्त न होने.का
नाम है।” * हज़रत शिबली (रह.)
“सूफ़ीवाद ईश्वर के स्वभाव को ग्रहणं करने का माम है।”
-हज़रत शिबली. (रह) .
: “सूफ़ीवाद अल्लाह के साथ आराम हासिल करना है।”
“हज़रत सहल-तुस्तरी (
“सूफ़ीवाद इसका नाम. है कि सूफ़ी ईश्वरीय प्रकाश से प्रकाशित हो
और ईश्वर के स्मरण से आनन्दित हो।” * , "सईद ख़राज. (रह.
“सूफ़ीवाद सुशील होने का नाम है।” ... -कशफुल-महजूब
व्याख्या - सूफ़ीवाद के विषय में महापुरुषों के-जो विचार यहाँ प्रस्तुत किए
गए हैं उनसे साफ़ मालूम: होता है. कि.सूफ़ीवाद वास्तव में ईश्वर से गहरा
और ख़ास सम्बन्ध स्थापित करने का नाम है। इसमें मनुष्य ईश्वर के लिए |
एकाग्र होता. है। उसकी निगाह अपने रबं (पालनकर्ता प्रभु) पर रहती है।
ईश्वर से उसकी लौ लगी रहती है! कल
ईश्वर कें स्मरण और उसकी याद से मनुष्य के हृदय और उसकी आत्मा
में ऐसी सफ़ाई आ जांती है कि सत्य को पहचानना उसके लिए मुश्किल नहीं
होता। जिस चीज़ को सामान्य विद्वान अपने अध्ययन और तर्क के द्वारा
जान पाते हैं वह उसे अपने अन्तर की शुद्धता और अभिरुचि से पा लेता
8. हे सूफ़ी बुज्ुगों की अनमोल बातें:
है। ऐसे लोग जनःसामान्य से विलग नहीं रहते। उनका हक़ अदा करते हैं।
लेकिन दिल में उनके ईश्वर बसा हुआ होता है। उससे वे कभी ग़ाफ़िल नहीं
होते। अल्लाह की याद और उसका प्रेम उन्हें अल्लाह (ईश्वर) के साथ व्यस्त
रखता है। इसी में उन्हें आराम और चैन भी मिलता है। उनकी कोशिश होती
है कि वे ईश्वर के गुणों से मार्गदर्शन प्राप्त करें। ईश्वर पवित्र है तो उनमें
भी पवित्रता पाई जाए। ईश्वर दानशील है तो वें भी दानशील बनें। लोगों
से घृणां नहीं प्रेम करें और उनका हित चाहें | इससे बढ़कर सुशीलता और.
क्या हो सकती है। हमारा सम्बन्ध खुदा और उसके बन्दों के साथ
अच्छे-से-अच्छा हो।
सूीबुद्दगॉंकीअनमोलबातें : . +* या न हू.
'यथार्थ/दर्शिता '
“प्रत्येक्र: चीज़? ईश्वरः के. गुण कां*प्रतीक है।. किन्तु “मानव-हृदंय-:
'ईश्वरः के सभीः गुणों: का. प्रतीक: है!”
-मौलानां:अशरफ़ अली थानवी (रह)
“जीव॑न अमंरत्व की, अभिव्यक्ति है।”
-मौलाना- अशरफ़ अली थानवी (रह-)
“ज्ञान एक प्रकाश है जो ईश्वर दिल में डालता है। ज्ञान अधिक
रिवायत का नाम॑ नहीं. है” -इमाम मालिक: (रह-)
“कर्मःमें*अधिंकंता-नहीं। परिपूर्णता अपेक्षित -है-”
.. -मौलालों:थानंवी (रह) -
“शुरीअत की*सभी*ज़ाहिरीःचीज़ें:भी/वास्तव॑ में :आन्तरिकःचीज़ों: ही
से: सम्बन्ध रखंती:हैं। उदाहरणःके:लिए:ईमीनःदेखने'में:मौखिक़े/
_- 'इक़राएं:है। लेकिन मूलतः-दिल-कीः तसदीक़ः (हदंय-की-युष्टि) का...
* इसमें शामिल होनाःआवेश्यंक है।” -कशफुलेनमहजूब,
व्याख्या +- महापुरुषों की इंन बातों से कई चीज़ें मालूंम होती हैं। दिलं-में यदि.
: सफ़ाई-हो'और उसंमें किंसी ग्रेंकार-कां-बिगाड़े नआया-होःतो वह ईश्व्रर-के
_सभी-गुणों का प्रतीक बन जाता है। दूसरी चीज़ों-सेःईइंवर के: कुछ हीगुणों-
का प्रदर्शनं:होता “है. हर
जीवनःअमरत्वःकाःसंदेश॑-है। इसे-यदि-हम.न समेझ सके-तोःजीवन*के
मूल्य का हमें आभासःन हो:सका | कुरआन के-लगभंग संभी पृष्ठों पर इसका. /
ध्यान दिलाया गया है। मनुष्य के. लिए जीवन की: अमरता उसकी नियति:
(तक़दीर) है। ज़रूरत है कि वह अपने चरित्र से अंपने-को इसके योग्य सिद्ध - *
कर सके। हि
ज्ञान वास्तव में अधिक जानकारी और हदीस और रिवायतों को कंठस्थ “
कि हु ह * र् : सूफी बुज्लुगों की अनमोल बातें
कर लेना नहीं है, बल्कि यह तो एक समझ और रौशनी है जो पवित्र आत्मा
लोगों के दिलों में डाली जाती है।
महत्व इसका है कि कर्म और उसके मूल उद्देश्य के मध्य संगति पाई ,
जाए। ग़ाफ़िल दिल से अधिक कर्म और उपासना को विशेष महत्व प्राप्त
नहीं ।:अभीष्ट कर्म की परिपूर्णता है और वह यह है कि हमारा कोई कर्म
अपनी आत्मा से रिक्त न हों।
' अन्तिम कथन जो सूफ़ीवाद की महत्वपूर्ण किताबू से उद्धृत किया गया
है, उसमें एक विशेष बात बताई गई है और वह यह है कि धर्म में मनुष्य
के अन्तर और आन्तरिक चीज़ों को मौलिक महत्व प्राप्त है! शरीअत के
सभी ज़ाहिरी आदेशों और कर्मों का सम्बन्ध अन्तर से है। वे केवल शुष्क
कर्म-कांडः नहीं हैं। इसे समझने के लिए हज़रत शाह वलीउल्लाह (रह-)
किताब “हुज्जतुलल्लाहिल-बालिग़ा” से मदद ली जा सकती है।
_सूफ़ी बुज्ल॒गों की अनमोल बातें हे ।]।
ईश्वर से सम्बन्ध और ईश-भय
. “ईश्वर ने शरीर की रचना की तो उसका जीवन प्राण (आत्मा) से
सम्बद्ध कर दिया और जब दिल बनाया तो उसका जीवन अपने-आप
से सम्बद्ध कर दिया ।” -कशफुल-महजूब
| “वास्तविक दृष्टि ईश्वर पर होती है, अन्य पर नहीं। बन्दे की
अपनी हस्ती भी अन्य में शामिल है (इसलिए उसे भी अपने लिए ,
आवरण (पर्दा) नहीं बनने देता) !” . -कशफुल॒-महजूब
* “ईश्वर दिशा से मुक्त है।!
,. “शैख़ अबू-उसमान सईद-बिन-सलाम मग्रिबी (रह-)
, “तमाम रात और दिन में कोई घड़ी ऐसी नहीं है जिसमें बन्दे-पर
हे अल्लाह का फ़ैज़ान (कृपा वृष्टि) न हो ।”
-अबू-बक्र शिबली (रह)
“गुनाह से नहीं, तौबा न करने से बन्दे की पकड़ होती है।”
-सैयिद अली समदानी (रह-)
“मग्फ़िरत (क्षमादान) की वास्तविकता पर्दापोशी है।”
-सहूल-तुस्तरी (रह)
“ऐ अल्लाह, मेरा काम और मेरी कामना दुनिया में तेरी याद है और
आख़िरत (परलोक,) में तेरे दर्शन ।”
-हज़रत राबिया बसरिया (रह-)
“ईश्वर से डरनेवाले सीधी राह पाते हैं और उससे न डरनेवाले
गुमराह हो जाते हैं।” ्ि -जुन्नून मिस्री (रह)
“आरिफ़ (ब्रह्मज्ञानी) की पहचान यह है कि लोगों में रहते हुए लोगों
'से व्रिलग हो। अल्लाह से डरनेवाले की आरिफ़ कहते हैं |”
-जुन्नून मिस्री (रह-)
सूफ़ी बुज्लुगों की अनमोल बातें
“उसकी कृपा से मुझे जीवन मिला हैं जिसे मृत्यु नहीं।”
-बायज़ीद बुस्तामी (रह)
“अल्लाह को-ऐसा समझो कि तू उसे अपनी आँख देख रहा है।” .
ह . , -अछुल्लाह-बिन-मुबारक (रह)
“परहेज़गारी करने से (बुराई से बचने से) मनुष्य ईश्वर की शरण:
'में आजाता है! -: -अबदुल्लाह-बिन-मुबारक (रह)
“ईश्वर के डरावे से न डरनो और ईश्वर के वादों (उसकी दी हुई '
' शुभ सूचनाओं) की आशा न रखना कुफ़ (अधर्म) है।”
-सहल-बिन-अदुल्लाह तुस्तरी (रह०) .
- “मैं प्रत्येक समय आन्तरिक रूप से अल्लाह के साथ रहता हूँ येद्यपि
देखने में लोगों सें मिला रहता हूँ।” .. -अबुल-हसन खरक़ानी (रह-)
“तौरात में ख़ुदा कहता है मैंने तुम्हें अपना मुशताक़ (चाहनेवाला) ह
बनाया किन्तु तुम न बने ।” />मालिक-बिन-दीनार (रह)
“मैं उसके (अल्लाह के) साथ में होता हूँ तब मेरा होना, होना होता
है।” * -अबू-बक्र शिबली (रह-)
व्याख्या - महापुरुषों के जो कथन यहाँ प्रस्तुत किए गए हैं वे बहुत
महत्वपूर्ण और स्पष्ट हैं। यह बात तो स्वर्ण से लिखने की है कि जिस तरह
शरीर आत्मा से ज़िन्दा रहता है, उसी तरह दिल की ज़िन्दगी का सम्बन्ध
: ईश-ज्ञान और उसके प्रेम और उसके स्मरण से है। अपनी दृष्टि ईश्वर पर"
रहनी चाहिए। इस सिलसिले में स्वयं अपने-आपको भी आवरण न बनने
देना चाहिए। ः
प्रत्येक अच्छी चीज़ के साथ हम उस ईश्वर को न भूलें जो ये चीज़ें हमें
देता है। उसकी वृष्टि निरन्तर होती रहती है। यह उसका विशेष अंनुग्रह है।
ईश्वर भीतिक चीज़ों के समान नहीं है, वह देश-काल से परे है। इसी
लिए “कशफ़ुल-महजूब' पुस्तक में यह लिखा है कि ईश्वर दिशा से मुक्त और
स्वतन्त्र है।
, सूफ़ी बुज्ुगों की अनमोल बातें | रा जुडे
अपनी दुर्बलता के कारण मनुष्य से गुनाह हो जाता है लेकिन-सच्चे दिल
“से 'तौबा-करके ईश्वर से यदि क्षमा माँगें तो. वह क्षमाशील और दग्नावान है,
“बह हमारे गुनाहों को क्षमा कर देता:है. और हमारे.ऐबों को-छिप़ाता-है।
जीवन में सबसे बड़ी चीज़.ईश्वर का भय है |:ईशं-भय के ब्रिना मनुष्य
का .सत्यमार्ग, पर चलना- सम्भव नहीं। हम कितने ; ही दार्शनिकों और
बुद्धिज़ीवियों को देखते हैं कि वे बुद्धि और चिन्तन. के बावजूद सत्य को
स्वीकार करने में असमर्थ रहे। कारण यह .कि उनके दिल में ईश्वर का भय
नहीं था।
ईश्वर और उसके आदेशों को सच्चे दिल से स्वीकार करना अनिवार्य है।
... ,फिर,अपनी ताक़त और सामर्थ्य.के अनुसार स॒त्य का,अनुसरण करे तो मनुष्य
अनिवार्यतः ईश्वर को पहचान जाएगा और उसकी प्रसन्नता उसे .प्राप्त
होगी।
ढ़. । ... सूफ़ी बुलुगों की अनमोल बाते
: दृष्टि परलोक (आख़िरत) पर
“उस दिन को निकट जान जिसके बाद दुनिया ही न होगी और
आख़िरत होगी।” -इमाम हसन बसरी (रह)
“बन्दे को ज्ञान के अनुसार भय होता है और बन्दे का जुहद
(परहेज़गारी, बैराग्य) दुनिया में उतना ही होता है, जितनी उसे
आख़िरत से मुहब्बत होती-है।” -फुज़ैल-बिन-अयाज़ (रह-)
“दुनिया को शरीर की आवश्यकता कें अनुसार और आख़िरत/को
आत्मा और हृदय की आवश्यकता के अनुसार हासिल करना
चाहिए!” -हज़रत सुफ़ियान सौरी (रह,
“तन से दुनिया में और मन (दिल) से आख़िरत में रह ।”
-शैस्र अवू-बक्र कतानी (रह-)
“वह व्यक्ति आख़िरत के मधुरत्व (मिठास) को नहीं पा सकता जो
इसका इच्छुक हो कि लोग उसे पहचानें” -बिश्व याफ़ी (रह-)
व्याख्या - वास्तविक जीवन तो पारलौकिक जीवन है। आख़िरत दुनिया के
मुक़ाबले में प्रत्येक पहंलू से उत्तम भी है और बाक़ी रहनेवाली भी | इसी लिए
उसे अमरलोक कहते हैं। आख़िरत का दिन ईश्वर से अनावरित रूप से
मिलने का दिन भी है। सांसारिक जीवन तो आख़िरत की भूमिका और
उसकी तैयारी के लिए है। आख़िरत पर जिस व्यक्ति को विश्वास नहीं वह
जीवन के मूल्य को नहीं समझ सकता।
आख़िरत दूर नहीं बहुत क़रीब है। आदमी जितना अधिक आख़िरत को
पसन्द करेगा। सांसारिक लोभ-माया से मुक्त होगा । वह इसे भी कोई महत्व
नहीं देगा कि लोगों में शोहरत हासिल हो।
जिस तरह मनुष्य के शरीर को दुनिया चाहिए उसी तरह मनुष्य की
प्रकृति शाश्वतत्व (गए) चाहती है। मनुष्य को अमर जीवन (ह/धणब ह
46) की कामना प्रदान की गई है।
सूफ़ी बुन्लुगों की अनमोल बातें - ॥]
“परोक्ष टैब) का महत्व
“ईमान और (ईश) ज्ञान की श्रेष्ठता का कारण यह है कि इनका
सम्बन्ध दीब' (परोक्ष) से है।”, -कशफुल-महजूब
- व्याख्या - मानव-जीवन- और जगतू का. बड़ा भांग परोक्ष (७४७००) से
: सम्बन्ध रखता है। जब तक परोक्ष सम्बन्धी चीज़ों और मामलों के विषय में
सच्चा ज्ञान प्राप्त न हो हम जीवन का कोई प्रामाणिक दर्शन निग्रत महीं कर
सकते और अविश्वास और संशय से मुक्त नहीं हो सकते।
जीवन और जगत के निर्माण का मूल उद्देश्य क्या है? इसका सम्बन्ध
परोक्ष से है। आख़िरत का शाश्वत और आनन्दमय जीवन ही वास्तविक
. जीवन है। आख़िरत और अल्लाह पर ईमान लाना ग्ैब (परोक्ष) पर ईमान
* लाना है। जीवन और परोक्ष.सम्बन्धी चीज़ों की सूचना ईश्वर मानवों को'
अपने पैगम्बरों के द्वारा देता रहा है। इससे बढ़कर ज्ञान प्राप्त करने का कोई
दूसरा साधन नहीं हो सकता।....
: फिर ईमान की बरकत्त से अल्लाह ईमानवालों के दिल को प्रकाश प्रदान
. करता है। जिन बातों की सूचना अल्लाह नें अपनी किताब या अपने नबी .
- के द्वारा दी है उनपर उन्हें ऐसा विश्वास. हो जाता है जिनमें उन्हें तनिक भी
सन्देह नहीं होता। अल्लाह ईमानवालों को विश्वास का जो प्रकाश- प्रदान
करता है उसका सम्बन्ध भी वास्तव में ग्रैब (परोक्ष) से होता है।
86 जा ... सूफ़ी बुल्लुगों की अनमोल बातें.
सुकर्म
. “अच्छे कर्म और जन्नत में वही सम्बन्ध है जो पानी पीने और
प्यास के बुझने में है।”
-हज़रत मौलाना अशरफ़ अली थानवी (रह-)
“शब्दों की शुद्धता का दर्जा दिल की नीयत की शुद्धता से कम नहीं
हे -हज़रत हबीव अजमी (रह)...
“जो ज्ञानवान अपने ज्ञान के अनुसार कर्म न करे वह उस शरीर
की तरह है जिसमें प्राण न हो।” 7. -इमाम अबूहनीफ़ा (रह)
व्याख्या - ज्ञान कर्म की अपेक्षा करता है। यदि कोई अपने ज्ञान के अनुसार
कर्म नहीं करता तो उसका ज्ञान निष्प्राण है। उस ज्ञान का विशेष महत्व
नहीं।
जिस तरह आदमी के लिए ज़रूरी है कि उसे हृदय की शुद्धता प्राप्त हो,
कपटाचार से मुक्त हो। उसका इरादा नेक और नीयत दुरुस्त हो, ठीक उसी
तरह उसके लिए यह भी आवश्यक है कि उसके मुख से जो शब्द भी निकलें
वे भी दुरुस्त और शुद्ध हों। वह सत्यवादी हो । भाषा की दृष्टि से भी उसके
मुख से निकले हुए शब्द शुद्ध हों। इसका ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक
है। शब्द. भी आदमी के चरित्र के परिचायक होते हैं।
सुकर्म और जन्नत के मध्य जो सम्बन्ध पाया जाता है उसे हज़रत ,
थानवी (रह.) ने एक महसूस मिसाल द्वारा स्पष्ट किया है। जिस तरह पानी
से प्यास बुझती है, ठीक उसी तरह अच्छे कर्मों से आदमी जन्नत का
अधिकारी हो जाता है। बज हे
___ | ७ ृ०क्ृख ल्न्््््ौऔ्टट“ःभभनभपनभभपफैफशफभ+5
सूफ़ी बुज्लुगों की अनमोल बातें ]7
मानव-्आंत्मा
“आत्मा परिमाण (0पथ॥79) और नियत रूप से मुक्त है। उसका
प्रदर्शन विभिन्न-रूपों या मिसालों में हो. सकता है।”
-शांह अंब्दुल-अंज़ीज़ मुहद्दिस देहलदी (रह-)
' “आंत्मा मकानी (भौतिक स्थान से) नहीं । क्योंकि जो-मकानी होती
है उसका विभाजन<सम्भव/होता है ।” -इमाम' ग़ज़ाली (रह-)
“आंत्मा सदैव से नहीं-है, वहःपैदा .की गई. है”
“इमाम गज़ाली .(रह-)
, “आत्मा अनिवर्चन्नीय और अयोगिक एवं सीमारहिंत .है।”
“हज़रत: शर्फुद्दीन यहया मनेरी' (रह०)
व्याख्या - मानव-आत्मा के विषय: में महापुरुषों के ज़ो.कथन प्रस्तुतःकिए
“गए.हैं। उनसे मानव की वििशिष्टता और:श्रेष्ठता का,पता चल॒ताःहै.इमाम
ग़ज़ाली (रह) ने अपनी कितांबं में आत्मा के.विषुय में जो कुछ लिखा-है वह
विस्तृत और तर्कसंगत है।
आत्मा कोई भौतिक चीज़ नहीं है अतः व॒ह दिकू-दिशा और भौतिक
स्थान से मुक्त है। मकानी होने की स्थिति में वह. विभाजित होती। आत्मा
अयोगिक्-है, उसके टुकड़े नहीं किए जा सकते । आत्मा का विशेष गुण ज्ञान
और चेतना है। सामान्य भीतिक चीज़ों से भिन्न होने के बावजूद वह संदैव
से नहीं है। ईश्वर ने अपनी-शंक्ति और सामर्थ्य'से उसे अस्तित्व प्रदांन किया
है। ५ ॥
नबी . (सल्ल.) ने कहा है कि : “अल्लाह ने अपने अनुरूप आदम
(मानव) को पैदा किया” मानव-आत्मा में ,ईश्वरीय गुण '(उदाहरणार्थ
जीवन, ज्ञान, संकल्प, कल्पना-शक्ति और कर्म आदि) की प्रतिछांया जिस
8 पा * सूफ़ी बुज्ञुगों की अनमोल बातें
दर्जा मानव-आत्मा में पाई जाती है वह किसी दूसरी चीज़ में नहीं पाई जाती ।
मानव-आत्मा (3००) और ईश्वर में जो अनुकूलता पाई जाती है, इसी लिए
.ईश्वर ने उसे अपने से सम्बन्धित किया है। यह.बड़ी श्रेष्ठता की बात:है।
'मावन-आत्मा को अस्तित्व प्रदान करने में ईश्वर ने अत्यन्त दानशीलता से
काम लिय़ा है। यह अलग बात है कि वह अपने बुरे कर्मों से उसे दूषित कर .
दे।
सूफ़ी बुजुर्गों की अनमोल बातें | 9
मौन ह
.. “नुबूबत (पैगम्ब्री) के बाद कोई दर्जा नहीं है, किन्तु हिकमत .
(तत्वदर्शिता) और हिकमत (शं56०7) का लक्षण मौन है। केवल
ज़रूरत के समय बात करनी चाहिए।”
-हज़रत अबू-बक्र वर्राक़ (रह)
“मौन की लज़्ज़त (रसास्वादन) अल्लाह से नूह (अलै.) की (दीर्घ)
आयु माँगती है ताकि मौन में गुज़ारे।” |
-हज़रत-अबू हफ़्स हदुदाद (रहः)
“जब हुज़ूरी (ईश्वर की उपस्थिति का एहसास) हासिल होती है तब
मौन अपना रूप दिंखाता है।” -वबायज़ीद बुस्तामी (रह)
“बातचीत, आवाज़, गति और अभिलाषा सब बाहर की चीज़ें हैं।
पर्दे के अन्दर सन्नाटा (मौन) और रोब (तेज) है।”
का 0 -बायज़ीद बुस्तामी (रह-)
व्याख्या -- मौन और ख़ामोशी* (800००) के महत्व को दुनिया के सभी
* मनीषियों और ज्ञानियों ने स्वीकार किया है। यह बड़े पते की बात है कि
पैग़म्बरी के बाद यदि किसी चीज़ को कोई दर्जा हासिल है तो वह हिकमत
(५४५१०४) है और हिकमत (तत्वदर्शिता) का लक्षण मौन-है। हिकमत
: वास्तव में इलहामी ज्ञान को कहते हैं। इसमें संदेह नहीं कि हिकमत एक .
: इलक़राई” (दिल में डाली जानेवाली चीज़) है। इसकी अभिव्यक्ति समयक
दृष्टि, बुद्धिमत्ता, परितोष, कृतज्ञता और सज्जनता के द्वारा होती है। हिकमत '
का गहरा सम्बन्ध मौन से है। ख़ामोश, मौन या शून्य से ही समस्त चीज़ें
निकलती हैं। ख़ामोशी में हज़ार नग्रमे निहित होते हैं। जिंस तरह आन्तरिक
वाणी ही व्यक्त वाणी का मूल है। मौन एक भाव है। सौन्द्र्य भी वास्तव
में एक आन्तरिक भाव है। जिन पवित्र आत्माओं की विशेषता मौन-होती है।
. ईश्वर की ओर से हिकमत उनके दिलों में डाली जाती है। इसी लिए ऐसे
20 सूफ़ी बुल्चुगों की अनमोल बातें
व्यक्ति से लाभ उठाने की शिक्षा नबी (सल्ल-) ने दी है। मौलिक चीज़
आन्तरिक है। बाहर की चीज़ों का भी महत्व है लेकिन उन्हें वह महत्व प्राप्त
नहीं है जो आन्तरिक और हृदय से सम्बन्धित चीज़ों को प्राप्त है। बातचीत
सारी दौड़-धूप बाहर की चीज़ें हैं। इनकी ज़रूरत से इनकार नहीं किया जा
सकता लेकिन खुशनसीब है वह व्यक्ति जो आध्यात्म के महत्व से परिचित
है। |
हुज़ूरी का भाव अपने साथ मौन लाता है। भौंरा जब फूल का रस लेता
है तो उसे चुप लग जाती है।
* . सूफी बुब्चुगों की अनमोल बातें श़
प्रभु-रचना या सुष्टि
“सारा जगत् ईश्वर की क्रिया है। जिस तरह मनुष्य अपनी गति
(चलना-फिरना) या स्थिरता बिना पदार्थ के पैदा कर लेता है उसी
तरह ईश्वर ने जगत् को अनस्तित्व से निकाल कर मौजूद' करे
दिया।” -हज़रत अनवर शाह कशमीरी (रह)
“दुनिया में जितनी चीज़ें हैं उन सबमें अल्लाह के गुणों और
क्रियाओं की अभिव्यक्ति है।” -हज़रत इब्न-अरबी (रह-)
“आत्मा जब छाया-लोक (आलम-ए-मिसाल) का वस्त्र पहनकर
खाने-पीने के योग्य हो जाए तो वह 'नसमह” (प्राण) कहलाती है |”
-अनवर शाह कशमीरी (रह)
व्याख्या - सृष्टि की समस्या बहुत ही नाजुक है। लेकिन महापुरुषों के
कथनों से मन और मस्तिष्क सन्तुष्ट हो जाते हैं। कुफ़ और शिर्क (अधर्म
और बहुदेववाद) में पड़ने से ईश्वर हमें बचा लेता है। वास्तविक अस्तित्व तो
वास्तव में ईश्वर का है। जगत् और जगतू की सभी चीज़ें अल्लाह के फ़ैज़
(ईश-क्रपा) से पैदा हुई हैं। ईश्वर की सत्ता एवं अस्तित्व किसी. चीज़: में
:« शामिल नहीं है। ईश्वर पवित्र, सीमा-मुक्त और अयोगिक है। वह अखन्डित
है। सृष्टि का सम्बन्ध ईश्वर की कृपा-छाया से है। सृष्टि से ईश्वर की पूर्णतः
. * और उसकी सत्ता और अस्तित्व में किसी प्रकार का अन्तर नहीं.आता। जैसे
.. दर्पण में बाहरी किसी रूप का प्रतिबिम्ब बनता है लेकिन दर्पण में बने
- - भ्रतिबिम्ब में वह बाह्य रूप सम्मिलित. या प्रविष्ट नहीं होता। हज़रत इब्न
“« अरबी (रह-) कहते हैं कि दुनिया की चीज़ें ईश्वर. के गुणों और कर्मों की
.* प्रतीक होती हैं। यह बड़ी श्रेष्ठता की बात.है.। एक व्यक्ति के पास एक
: /साधंरण-सा दर्पण था। वह कहता था कि मैं इसे किसी-क़ीमंत पर किसी को
नहीं दे सकता क्योंकि सैफ़ (यूनान की प्रसिद्ध कवयित्री) ने एक बार इसमें
': “ अपना रूप देखा था। यह जीवन-दर्पण“ईश-गुणों का दर्पण है। इससे इस
का हि सूफ़ी बुल्नु्गों की अनमोल चातें
दर्पण के मूल्य-का अन्दाज़ा प्रत्येक व्यक्ति 'करः सकता: है:
हज़रत अनवं॑र “शांह कशंमीरी ने. सृष्टि: को? ईश्वर: की क्रिया! कहकर: ह
समस्या:को अधिक सरल बनो दिया-जिसे सामान्य*व्यक्तिःभीः समझ:सकेता"
है। सम्पूर्ण जगत्, रूप, रंग सब-उसकी क्रिया हैं।
सूफ़ी बुजुर्गों की अनमोल बातें... ः 28
)
नमाज़ और उपासना
“नमाज़ अल्लाह से मिलने को कहते हैं ।” -बायज़ीद बुस्तामी (रह-)
“नमाज़ की मूल आत्मा ईश-भय और विनीति (ख़ुशूअ और
ख़ुज़ूअ) है और पूरी नमाज़ दिल की हुज़ूरी है।” -इमाम ग्रज़ाली (रह) '
“नमाज़ ईश्वर के साथ मिलने का नाम है। इस मिलने को ईश्वर
ही जानता है।” * -मौलाना जलालुद्॒दीन रूमी (रह-)
“ईश्वर को इस तरह याद करों कि दोबारा याद न करना पड़े
(अर्थात् ईश्वर को कभी भूलो ही नहीं)।”
-अबुल-हसन ख़रक़ानी (रह-)
इनसान को चाहिए कि आधी रात को उठकर वुज्ू करे और चार
रकात नमाज़ पढ़े। यर्दि यह न हो सके तो दो रकात नमाज़ पढ़े।
यदि यह भी न हो सके. तो 'ला-इला-ह-इल्लल्लाहु मुहम्मदु-रसूलुल्लाह'
(अल्लाह के सिवा कोई प्रभु-पूज्य नहीं। हज़रत मुहम्मद (सल्ल,)
अल्लाह के रंसूल (पैगम्बर) हैं। कहे ।” हि
- -अबू-इसहाक़ इबराहीमं-विन-शहरयार (रह-)
“इबादत ग़्ायबाना (परोक्ष) में होती है और वहाँ (आख़िरत में)
हुज़ूरी होगी। इसलिए वहाँ इबादत (पूजा, उपासना) नहीं है। केवल
ईश-स्मरण रह जाएगा ।” -हज़रत शर्फुदुदीन यहया मनेरी । (रह-) ;
व्याख्या - महापुरुषों की इन बातों से कई बातें मालूम होती हैं। कुरआन
से मालूम होता है कि नमाज़ का आदेश अल्लाह की याद और उसके स्मरण
के लिए दिया गया है और स्मरण के लिए हुज़ूरी ज़रूरी है। एक महत्वपूर्ण
- पहलू यह भी हमारे सामने रहे कि नमाज़ में बन्दा ईश्वर के समक्ष उपस्थित
होता है, जो देश-काल से परे है। मानो नमाज़ पढ़नेवाला जगत्. में रहते हुए
अपनी नमाज़ों में समय और भौतिक स्थान की परिधि से मुक्त हो जाता है।
उसकी उच्चता और पवित्रता का क्या कहना!
“5 - सूफ़ी बुन्नुगों की अनमोत्र बातें ,
बन्दा ईश्वर को कभी न भूले यही स्मरण का आधिक्य (ज़िक्रे-कसीर)
है। यह बड़ी ही ख़ूबी की बात है कि रात की घड़ियों में भी वह अपने रब
. को याद करे जबकि लोग सो रहे होते हैं।
दुनिया में अल्लाह की इबादत ग़ायबाना (परोक्ष) रूप से की जाती है। .
इसलिए कि दुनिया में हमारी आँखों को ईश-दर्शन की सामर्थ्य प्राप्त नहीं ।
लेकिन आख़िरंत में मोमिनों (ईमानवालों) को ईश्वर का ऐसा सामीप्य प्राप्त
होगा कि वे ईश्वर के दर्शन भी कर सकेंगे। अल्लाह की हुज़ूरी उन्हें नित्य
प्राप्त होगी, जो नमाज़ और इबादत कां सौन्दर्य और उसकी मूल आत्मा है।
उस लोक में अल्लाह की याद और हुज़ूरी को इबादत का दर्जा हासिल होगा।
सूफ़ी बुज्ञगों की अनमोल बातें 25-
संमय
“आत्माओं के लोक में भूत और भविष्य एक ही हैं।” े
-अवू-बक्र शिवली (रह-)
“विद्वान कहते हैं कि काल (समय) तीन हैं। भूत, भविष्य और
वर्तमान । और समय पैदा होता है नभ (फ़लक) की गति से | जिस
समय को सम्बद्ध किया जाता है ईश्वर से वह एक अद्वितीय बिन्दु
है। भूत, भविष्य, वर्तमान सबसे बाहर है। इसलिए वहाँ न नभ
(फ़लक) है न नभ-गति है। वह आदिकालिक और अनन्त है। आदि
और अनन्त अद्वितीय बिन्दु हैं। उस सम्बन्ध की दृष्टि से”
-हज़रत शर्फ़ुदुदीन यहया मनेरी (रह-)
व्याख्या - देश-काल (उरव6 ॥0 59808) के विषय में बड़ी बहसें हुई हैं।
लेकिन आइनस्टीन से बहुत पहले महापुरुषों ने अपना यह विचार व्यक्त
किया है कि काल या समय की हैसियत अवास्तविक और सापेक्ष है। यह
कोई वास्तविक चीज़ नहीं है। इसका सम्बन्ध ख़याल और विचार से है। इसी
लिए कहा जातां है कि जहाँ समय का पता नहीं चलता उसे हम आत्मा कहते
हैं। आवाज़ को देखने की कोशिश और आत्मा में समय की तलाश व्यर्थ है।
96 सूफ़ी बु्ल॒ुगों की अनमोल बातें
कुछ महत्वपूर्ण विषय
इज़्ज़्त: - “इज़्ज़तः (प्रतिष्ठा) वही है जो बन्दे को .सत्य अर्थात
अल्लाह के, हुज़ूर पहुँचा दे!” .. .. ... -हम़रत शिबली (रह)
सफ़ा --“सफ़ा से अभिप्रेत अल्लाह की जनाब में (ईश्वर के समक्ष) '
वह हाज़िरी है जो नित्य है।” . -दाता गंज बड़ा अली हिजवरी (रह-)
वास्तविक ज्ञान -:"ज्ञानवान वह. है जो ज्ञान से नहीं बल्कि
अपने-आप से (स्वभावतः) ज्ञानी और बुद्धिमान हो ।”
| -अबुल-हसन ख़रक़ानी (रह-)
* जुहद (वैराग्य) - “जिस चीज़ से हाथ ख़ाली हो. उससे दिल भी
ख़ाली हो ।” - पु ... . . >जुनेद बग़दादी (रह-)
सत्य दर्शन -- “आख़िरत (पंरलोक) में जिस चीज़ को दिल चाहे
वह चीज़ उसके ख़याल में .हाज़िर हो जाएगी। अतः उसका चाहना _
उसके ख़याल में आने का कारण और उसका ख़याल में आना
उसके देख लेते का कारण होगा ।” -इमाम ग़ज़ाली (रह-)
ज्ञान (ब्रह्म-ज्ञान) -- “ईश्वर :इस दुनिया में जानने के लायक़ है
और उस दुनिया (आख़िरत) में देखे जाने के-लायक़ ।”
-इमाम- ग़ज्ाली (रह)
“कणभर ईश-ज्ञान में जो आस्वादन (लज़्ज़त) है वह जन्नत की
' नेमतों में नहीं.मिलता।” _... : ्बायज़ीद बुस्तामी (रह०)
साक्षात्.((मुशाहिदा) - “ईश्वर के गुणों का बन्दे पर प्रकट होना
मुशाहिदा है।” ॥ *... <अबू-्वक्र शिवली (रह)
“मुशाहिदाः (साक्षात्) इबादत (पूजा) को कहते हैं|”.
-. -सहल-बिन-अब्भुल्लाह तस्तरी (रह-)
ततजल्ती (ईश-आलोक) - “तजल्ली से अभिप्रेत ईश-प्रकाश का
सूंफ़ी बुह्ञगों की अनमोल बातें ,
शर्ः़ः
वह प्रभाव है जो ईश्वर के प्रिय बन्दों के दिलों पर होता है। जब
वे इसके योग्य होते हैं।” - -कशफुल-महजूब
पाकीज़गी (पवित्रता) - “मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति पवित्रता
से प्राप्त होती है। केवल कर्म की अधिकता कभी उन्नति का कारण
नहीं होती ।” -हज़रत अबुल-हसन ख़रक्ानी (रह-)
सब्र -- “सब्र करनेवाला ईश्वर से संयुक्त होता है।”
; -हज़रत अबू-अली ज्ुरजानी (रह-)
वली (ईश-मित्र) - “जो अपने हाल से ख़ाली और ईश-साक्षात् से |
बाक़ी हो।” ४ -अबू-अली जुरजानी (रह)
दर्द (प्रेम-पीड़ा) - “बन्दा अल्लाह को बुद्धि से पहचानत्ता है तो
उसे ज्ञान प्राप्त होता है, ईमान से पहचानता है तो उसे सुख प्राप्त
होता है और यदि “मारफ़त” (आध्यात्म ज्ञान) से पहचानता है तो
उसे दर्द (प्रेम-पीड़ा) प्राप्त होता है।”
-हज़रत अबुल-हसन ख़रक़ानी (रह)
फुतूबत (पुरुषार्थ) - “फ़ुतूबत यह है कि तुम लोगों के मामलों में
न्याय करो और अपने मामलों में उनसे न्याय के इन्तिज़ार में न
रहो ।” . -हारिस मुहासिवी (रहं-)
-दाबत (आमंत्रण) -- “लोगों को उपदेश दो और उन्हें अल्लाह की
ओर बुलाओ और अपने को मध्य में ख़याल न करो ।”
-हज़रत यूसुफ़-विन-हुसैन (रह)
व्याख्या - महत्वपूर्ण समस्याओं के अन्तर्गत महान पुरुषों के जो कथन
प्रस्तुत किए गए हैं वे वास्तविक रूप से महत्व रखते हैं। उन कथनों से पता
चलता है कि अपने रब (प्रभु) से उनका सम्बन्ध कितना बढ़ा हुआ था।
ईश्वर के प्रेम और उसके स्मरण में जीने को वे जीवन समझते थे। ईश्वर
की उपस्थिति और उसके सामीप्य के एहसास को वे दुनिया और दुनिया की
हर चीज़ से बड़ी नेमत समझते थे। वे जानते थे कि इज़्ज़त (प्रतिष्ठा) ईश्वर
से दूरी में नहीं उसके सामीप्य में है और उसकी कृपा और अनुग्रह के बिना
28 हि सूफ़ी बुल्गुगों की अनमोल बातें
मनुष्य सत्य से वंचित रह जाता है। भले ही देखने में वह कितना. ही बड़ा
मनीषी क्यों न हो। उनपर यह सत्य प्रकट था कि दुनिया को यह हैसियत
हासिल नहीं कि कोई उसे जीवन का: मूल उद्देश्य बना ले।
दुनिया में ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करना मनुष्य, के लिए अनिवार्य है।
, उसके दर्शन के लिए परलोक है। ईश-सौन्दर्य और ईश्वर की पूर्णतां और
सामर्थ्य की निशानियाँ चारों ओर फैली हुई हैं। उसका ज्ञान जीवन का
वास्तविक विलास और आनन्द है। दुनिया में उसका साक्षात् या मुशाहिदा
यही है कि हम उसके गुणों से परिचित हों और उनसे लाभ उठाएँ। उसके .
सामीष्य का एहसास हमारे अन्दर भक्ति भाव पैदा करता है। दुनिया में उसे
सीधे देखने की ताब हमारी आँखों को नहीं। वर्तमान जीवन में उसकी
तजल्ली या आलोकन यही है क़ि उसके प्रकाश और महिमा का हमारे दिलों
पर असर हो। वली (ईश्वर का मित्र) वही है जिसकी दृष्टि वास्तव में स्वयं
अपने पर भी न हो। उसका जीवन ईश्वर का साक्षात् होकर रह जाए। हर ,
चीज़ में उसे खुदा की शान और सामर्थ्य दिखाई देने लगे। ऐसे लोगों के यहाँ '
सब्र और शुक्र (धैर्य और कृतज्ञता) आदि की हैसियत ईश्वर से संयुक्त .
(वासिल) रहने की होती है। अर्थात् उनके लिए अपने रब से हार्दिक सम्पर्क
एवं सम्बन्ध की बात है.। -
उनके यहाँ प्रेम-पीड़ा को बड़ा महत्व प्राप्त है। ईमान उनके लिए सबसे
बड़ा सुख और आनन्द है। जीवन में वास्तविक महत्व पवित्रता और मन की
शुद्धता को प्राप्त है। इसके बिना आत्मिक विकास और उच्चता प्राप्त नहीं
हो सकती | आत्मा की पवित्रता के बिना मनुष्य के कर्म निष्प्राण होते हैं।
जिसके कारण जीवन में जो सर्वोच्चता अभीष्ट है उससे मनुष्य वंचित रह
जाता है।
पवित्र आत्माओं के पुरुषार्थ और उनकी हृदय विशालता (४०७७
॥०2४०१॥०४७) का हाल यह होता है कि कोई उनके साथ इनसाफ़ करे या
न करें लेकिन वे इनसाफ़ का दामन कभी नहीं छोड़ते । उनसे इनसाफ़ ही की
आशा की जा सकती है।
सूौ़ी बुहुगों की अनमोल बातें 2० 29
फ़िर ईश्वर के जिस सन्देश और जिस दीन या धर्म को वे सत्य और
जिसपर वे मनुष्य की मुक्ति को निर्भर समझते हैं उससे वें स्वयं ही-
लाभान्वित नंहीं: होते बल्कि उनकी कामना होती है कि सम्पूर्ण मानव-जाति
' उससे लाभान्वित हो। इंसंलिएं लोगों को सत्य से परिचित करते और उन्हें
ईश्वर की ओर आमंत्रित करते हैं ।ईश्वर की बन्दगी और उसके आज्ञापालन
* से ही ईशंवर की प्रसन्नता प्राप्त होतीं है और इसी पर मनुष्य की मुक्ति निर्भर
. करती है। यही चीज़ लोगों को परस्पर ज़ोड़तीं और उनमें एकता पैदा कर
सकंती है।
80 श * <सूफ़ी बुब्लुगों की अनमोल बातें